हमें तीन वस्तुओं की आवश्यकता हैः अनुभव करने के लिए ह्रदय की, कल्पना करने के लिए मस्तिष्क की और काम करने के लिए शरीर की।
कम्प्यूटर भले 100 साधारण मानवीय-मष्तिष्क जितना शक्तिशाली हो जाए। शरीर का विकल्प रोबेट भी मानव से अधिक क्षमतावान हो सकता है। परन्तु अनुभव करने के लिए ह्रदय का अभाव कम्प्यूटर को सदा मानव से निकृष्ट बनाए रखेगा। कम्प्यूटर समोसा बना सकता है परन्तु उसके स्वाद का अनुभव नहीं कर सकता। कम्प्यूटर भगवान की मूर्ति का निर्माण भले ही कर ले परन्तु वह भक्ति नहीं कर सकता। कम्प्यूटर मानव के लिए बना है मानव कम्प्यूटर के लिए नहीं बना। और कम्प्यूटर कभी कमेटियों का विकल्प भी नहीं बन सकते चूंकि कमेटियाँ ही कम्प्यूटर खरीदने का प्रस्ताव स्वीकृत करती हैं।
कम्प्यूटर का स्तर कैल्कुलेटरादि यंत्रो से अधिक अवश्य है परंतु है तो कम्प्यूटर भी एक यंत्र ही। आज के युग में बच्चे कंप्यूटर व कैल्कुलेटर का अधिक प्रयोग कर रहें है जिससे गणना के परंपरागत तरीकों से वे कोसों दूर जा चुके हैं। ऐसी परिस्थितियों में बच्चों के दिमाग की कसरत नहीं हो पाती और बच्चे बेसिक ज्ञान में पीछे रह जाते हैं। इससे बच्चों के बौद्धिक विकास में कमी रह जाती है। पौराणिक गणना पद्धति से बच्चा न केवल अत्याधिक तीव्र गति से गणना कर सकता है बल्कि इससे बच्चे में आत्मविश्वास, एकाग्रता, परिपक्वता की भावना भी जागृत होती है।
आप कहेंगे आखिर मैं कहना क्या चाहता हूंॽ बस यही कि कम्प्यूटर पर आवश्यकता से अधिक निर्भर नहीं होना चाहिए। हम नेट के दीवानों की कोई शाम वर्ल्ड वाइड वेब पर बिताना ऐसा ही है जैसा कि आप दो घंटे से कुरकुरे खा रहे हों और आपकी उँगली मसाले से पीली पड़ गई हो, आपकी भूख खत्म हो गई हो, परंतु आपको पोषण तो मिला ही नहीं। चलो आपकी प्रतिक्रिया पाकर ही दिल को संतोष होगा कि कुछ तो मिला। जयसच्चिदानंद!
Thursday, July 23, 2009
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